Friday, 18 May 2012

बेरोजगारीभत्ते का सच 

असली फायदा किसको बेरोजगार या राजस्व विभाग के भ्रस्तअधिकारीयों

अधिकारीयों ने बेरोजगारी भत्ता योजना नियमावली  बनाने में  बेरोजगारों  के बजाय  तहसील के घूस खोर लेखापाल तथा बेईमान बाबुओं का हित देखा जब भत्ता पाने केलिए किसी प्रकार की जाती आधारित व्यवस्था नहीं है तो फिर जाती प्रमाणपत्र की मांग क्यों  जबावेदक को बैंक से खाते का प्रमाण पत्र लेना है ओर  बैंक में  खता बिना निवास के नहीं खुलता है  तो फिर अलग से निवास प्रमाणपत्र की मांग क्यों आय प्रमाण  तो उनही लोगो का बनता है जो लेखपाल को उसकी मांग के अनु रूप सुविधा शुल्क  देने में समर्थ होते हैं जो वास्तव में गरीब होते हैं  उनके लिए आय प्रमाणपत्र बनवापना संभव नहीं होता   ऐसे  में  बेरोजगार के लिए आय जाती निवास  प्रमाणपत्र बनवाने केलिए  कमसे कम रूपया 1000 एक हजार किअवास्यकता होगी तथा सपथ पत्र का रूपया 100 फार्म जमा करने का सुविधा शुल्क रूपया 100 टिकट लिफाफा आदि का 100  किरयाभारा आदि जोरकर  लगाभः एक आदमी पर कमसे कम रूपया 2000 लगेगा सवाल ये बनता है की जो वास्तव में बेरोजगार है वो इतना पैसा लाये कहाँ से  जिसकी व्यवस्था बेरोजगार के लिए मुस्किल होगी  ऐसे में जहाँ बेरोजगार आवश्यक पेपर बनवाने में तह्सील में एक मेज  दूसरी मेज पर चक्कर लगाना परेगा वही दू सरी ओ र  तहसील के कर्मचारी मालामाल होंगे  वर्त्तमान में  बेरोजगारों के हित के लिए बनायीं जाने  योजना में आय जाती निवा स   यह सोचे बिना की इसकी उपयोगिता क्या है लागू  करना यह दर्शाता है की  सारी  योजनायें गरीबों को लू टने के लिए बनी हैं  सर्कार के लिए उचित होगा की  वोह कोई नयी यो जना भले न बनांये  पर  जनता को लू टने वाले  तहसील  ब्लाक  तथा  थाना को भ्रस्ता चार मुक्त करदे  जिसके लिए आवश्यक है की जवाब देहि सुनिश्चित की जा सके आवश्यकता नए कानून बनाने की नहीं है आवश्यकता है  बनेहुए कानून पर अमल करने की   मे  यह बात सप्रमर कह सकता हूँ की  सरकारी नियमो  का पालन  लेखापाल से लेकर मुख्य  सचिव कार्यालय  तक में नहीं होता है     

यदि सरकार वास्तव में बेरोजगारों के लिए कुछ  करना चाहती है  उसे ततकाल  भत्ता पाने केलिए बनाई गयी नियम वाली में संसोधन करके  तहसील से आय जाती निवास समाप्त करके केवल बेरोजगार से सपथ पत्र इस बात का ले की वह बेरोजगार है  तथा उसका निवास जातीजो फार्म में अंकित है सही यदि ये गलत पाया जाता है तो आवेदक भत्ता वापस  करने को बाध्य होगा 

Thursday, 26 April 2012

सूचना अधिकार अधिनियम का सच
उत्तर प्रदेश में  सूचनाधिकार अधिनियम सफ़ेद हाथी साबित हो रहा है  / उक्त अधिनियम के तहत आवेदक द्वारा आवेदन करने पर या तो  कोइ जवाब नहीं दिया जाता है  या गलत सूचना दे दी जाती है  / पुनः आवेदक द्वारा प्रथम अपील करने पर अपीलीय अधिकारी द्वारा अपील पर कोई सुनवाई नहीं की जाती है जबकि अधिनियम के साथ साथ  मुख्या सचिव का स्पस्ट आदेश विद्यमान है की अपीलीय अधिकारी अपील पर सुनवाई करते हुए सूचना दिलाने के साथ साथ अपील पर निर्णय  स्पीकिंग आर्डर के रूप में करें  किन्तु मुख्या सचिव के आदेश का पालन  अन्य विभागों में तो दूर  स्वयं मुख्यसचिव सचिवालय  के अपीलीय अधिकारी द्वारा नहीं किया जाता है / अन्ततोगत्वा आवेदक अंतिम आस के साथ अंतिम अपील आयोग में करता है आयोग में  अपील पर सुनवाई सुरु होने की कोई सूचना आवेदक को नही दी जाती  यदि आवेदक किसीतरह से पतालागाकर आयोग में सुनवाई के समय उपस्थित होता  है तो वहां सूचना की जगह तारिख मिलती है  तथा माननीय आयुक्त महोदय निस्पछ आयुक्त के स्थान पर ऐसा बर्ताव करते हैं जैसे वो सुछानाधिकारी के वकील हों  बिना सूचनाधिकारी द्वारा दीगयी   सूचना की जाँच  किये  बिना स्पीकिंग आर्डर के वाद का निस्तारण  कर दिया जाता है / इस  पूरी प्रक्रिया  में लगभग दो साल  का समय और धन खर्च  होने के बाद सूचना  तो नहीं  मिलती  मिलता है तो  सम्बंधित  अधिकारी द्वारा  अंत हीन उतपीरन  / पिछली दो सरकारों  के कार्य काल  में  किसी भी सर्कार ने सूचनाधिकार के लिए संवेदनशीलता  नहीं दिखाई  दिखी तो केवल अपनों को  बिना योग्यता का विचार किये  आयुक्त बनाने का सफल प्रयास 
 उठो संगठित  हो और अपने अधिकारों के लिए  संघर्स  करो / संघर्स सफलता की कुंजी है